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    दरिद्रता और ऋणमुक्ति के लिए करें, धूमावती की आराधना

    धूमावती ! दस महाविद्याओं में से सातवीं महाविद्या हैं, जो ज्ञान, वैराग्य तथा दरिद्रता की देवी हैं। इनकी आराधना शत्रुओं के विनाष तथा वैराग्य की प्राप्ति के लिए की जाती है। यह सौंदर्य के प्रति विरक्ति की प्रतीक हैं, जिनकी वेषभूषा विधवाओं जैसी है। दरिद्रता एवं ऋण से मुक्ति तथा अपना फंसा हुआ धन पुनः प्राप्त करने के लिए माता धूमावती की आराधना रात्रि में सफेद पुष्प्प आदि वस्तुओं से की जाती है। इनका इकलौता मंदिर मध्य प्रदेष के दतिया स्थित पीताम्बरापीठ परिसर में है, जहां मंगौड़े, कचैड़ी, नमकीन सेव आदि का प्रसाद चढाया जाता है। यहां हर साल ज्येष्ठ शुक्ल अष्टमी कोे धूमावती का स्थापना दिवस मनाया जाता है जिसके अंतर्गत मां का अभिषेक कर प्रसाद वितरण किया जाता है। यह दो जून, 2017 को है। यहां धूमावती जयंती दीपावली से एक दिन पूर्व नरकचतुर्दषी को मनायी जाती है।

    यू ंतो दस महाविद्याएं षिवजी के महाकाल आदि दस अवतारों की शक्तियां हैं पर धूमावती ने महादेव को ही निगलकर अपनी अकिंचन महाषक्ति को प्रमाणित कर दिया है। कथानुसार माता पार्वती भगवान षिव के साथ कैलाष पर विराजमान थीं कि उन्होंने महादेव से अपनी क्षुधा निवारण के लिए भोजन मांगा। कई बार मांगने पर उन्हें भोजन न मिला तो माता पार्वती ने षिवजी को ही उठा कर निगल लिया। इसके उपरांत पार्वती के शरीर से अपार धूम्रराषि यानी धुआं निकला जिससे वह ढक गयीं। षिवजी ने अपनी शक्ति के द्वारा कहा कि तुम्हारा सुंदर रूप धुएं से ढकने के कारण तुम धूमावती कही जाओगी। षिवजी को निगलने के कारण उनका कोई स्वामी न होने से विधवा तथा स्वयं नियन्त्रिका कहलायीं। दुर्गासप्तषती के अनुसार जिस देवी ने प्रतिज्ञा की थी कि जो मुझे युद्ध में जीतकर मेरा गर्व दूर कर देगा वही मेरा भर्ता होगा। ऐसा कभी भी कोई नहीं कर पाया, इसलियंे वह हमेषा कुमारी ही हैं। धन और पतिरहित होने के कारण वह विधवा एवं विरक्ति की देवी हैं। नारदपांचरात्र के अनुसार इन्होंने ही अपने शरीर से उग्रचण्डिका को प्रकट किया था जो राक्षसों से युद्ध के दौरान सैकड़ों गीदड़ियों की आवाज निकालती थी। इनकी भूख का रहस्य यह है कि इन्हीं की अंगभूता षिवाएं असुरो के कच्चे मांस से तृप्त हुईं थीं।

    स्वतंत्र तंत्रानुसार सती ने दक्ष यज्ञ में योगाग्नि से खुद को भस्म किया था, तब उससे निकले धुएं से धूमावती का प्राकट्य हुआ था। शाक्तप्रमोद में कहा गया है कि धूमावती की उपसना विपत्ति नाष, युद्ध में विजय, उच्चाटन, मारण आदि के लिए की जाती है। इनकी उपासना करने वालों पर दूसरों के द्वारा किये गये दुष्टाभिचार का भी कोई प्रभाव नहीं होता है। धूमावती लक्ष्मीजी की ज्येष्ठा हैं तथा इनका प्राकट् ज्येष्ठा नक्षत्र में हुआ था। ये उग्रतार हैं। दुर्गासप्तषती में वाभ्रवी तामसी नाम से इन्हीं की चर्चा की गयी है। ऋगवेदोक्त रात्रिसूक्त में इन्हें सुतरा कहा गया है। वेद की शब्दावली में धूमावती कद्रु हैं, जो वृतासुर आदि को पैदा करती है। ये अपने साधको पर पसन्न होने से उनके समस्त कष्टों का हरण कर लेती हैं तथा रुष्ट होने पर उनकी संपूर्ण कामनाओं को ही नष्ट कर डालती हैं। इनका ध्यान इस तरह करें-

    विवर्णाचंचलादुष्टादीर्घा च मलिनाम्बरा, विवर्णकुण्डलारुक्षाविधवाविरलद्विजा।

    काकध्वजरथारूढा विलम्वितपयोधरा सूपहस्तातिरुक्षाक्षी धृतहस्ता वरान्विता ।

    प्रवृद्धघोड़ातुभृंषकुटिलाकुटिलेक्षणा क्षुत्पिपासार्दिदता नित्यंभयदाकलहप्रिया।

    इनका जप मंत्र- ओम् ह्रीं क्रीं श्रीं धूं धूं धूमावती ठः ठः फट् स्वाहा । इस मंत्र का जप स्वेत तुलसी की माला से करें।हम अपने पाठकों को माता धूमावती और पीताम्बरा के अनुष्ठानों के प्रभाव के संस्मरण से अवगत कराना अत्यंत आवष्यक समझतें हैं। वर्ष 1962 में ड्रेगन यानी चीन ने भारत पर आक्रमण कर हमारे देष के भीतर काफी भूभाग पर कब्जा कर लिया था। उस समय की महाषक्ति यानी रूस के आग्रह को भी नजरंदाज कर चीन पीछे हटने को राजी न हुआ। इससे चिन्तित राष्ट्र गुरू एवं पीताम्बरा पीठाधीष्वर, दतिया (मप्र) परम पूज्य श्री स्वामीजी महाराज ने राष्ट्र रक्षा अनुष्ठान के लिए शक्ति उपासकों का आहृवान किया। उनके आहवान पर काषी, प्रयाग, विंध्यांचल, वैद्यनाथ धाम, जालौन, नागपुर, मथुरा, पटियाला, धौलपुर, ग्वालियर, भरतपुर, गढवाल से पधारे 75 शक्ति उपासकों ने पूज्य स्वामी जी के निर्देषन में अनुष्ठान शुरू किया, जिसमें 40 पंडितो ने श्री बगलामुखी के मूल मंत्र से संपुटित श्रीदुर्गा सप्तषती का पाठ, 11 पंडित मूलमंत्र का जप, 11 पंडित रुद्र्र्र्र्राभिषेक तथा 11 पंडित श्रीधूमावती के मंत्र का जप करते थे। श्री धूमावती का जप रात्रि में नौ से दो बजे तक तथा अन्य पाठ, जप एवं रुद्राभिषेक प्रातः आठ बजे शुरू होकर दोपहर बाद चार बजे तक चलता था। यह क्रम 18 दिसम्बर 1962 को प्रारम्भ हो कर 20 जनवरी 1963 को 34वे दिन सम्पन्न हुआ। बताते हैं कि ज्यों ही इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति दी गयी उसी समय बीबीसी लंदन पर समाचार प्रसारित हुआ ‘चीन पीछे हटा, भारतीय जमीन छोड़ी।

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    भारतीय ज्योतिष में विवाह के प्रकार

    प्राचीन काल के विद्वानों ने आठ प्रकार के विवाहों का उल्लेख किया है जो निम्नलिखित प्रकार के होते थे. इनमें से कई विवाह तो अब समाप्त हो चुके हैं लेकिन फिर भी हम सभी आठों प्रकार के विवाह का संक्षिप्त वर्णन कर रहे हैं|

    1) ब्रह्म विवाह – Brahma Marriage

    यह विवाह प्राचीन काल से अभी वर्तमान समय तक चला आ रहा है. इस विवाह में कन्या का पिता अपनी पुत्री के लिए एक सुयोग्य वर का चुनाव करता है. अपनी सामर्थ्यानुसार अपनी पुत्री को धन, आभूषण तथा वस्त्रादि देता है और अपनी कन्या का दान करता है. सभी आठों प्रकार के विवाह में यह सबसे सम्मानीय विवाह माना गया है.

    2) देव विवाह – Dev Marriage

    इस विवाह के अनुसार कन्या का पिता अपनी पुत्री को एक वस्तु की तरह किसी पुरोहित अथवा पंडित को दान कर देता था लेकिन समय के साथ पुरोहितों का महत्व खतम होने के साथ विवाह की यह प्रथा भी समाप्त हो गई है.

    3) आर्ष विवाह – Aarsha Marriage

    इस विवाह के अनुसार वर, कन्या के पिता को किसी धार्मिक कार्य को संपन्न करने के लिए गाय या बैल आदि देता था और कन्या से विवाह करता था लेकिन समय के साथ यह प्रथा भी लुप्त हो गई हैं. पर हो सकता है कि आदि जातियों में यह प्रथा कहीं चल रही हो.

    4) प्रजापत्य विवाह – Prajapatya Marriage

    यह विवाह केवल संतान प्राप्ति हेतु किया जाता था जिसमें कन्या के गर्भवती होने के बाद उसे छोड़ दिया जाता था. इस विवाह का उद्देश्य धर्माचरण हेतु संतान उत्पत्ति ही था जिसमें बच्चे की देखभाल केवल उसकी माता ही करती थी. पहले संतान के जन्म को भी धर्म की तरह पवित्र माना जाता था और इसी भावना से यह प्रथा आरंभ हुई लेकिन वर्तमान समय में यह प्रथा समाप्त हो चुकी है.

    5) आसुर विवाह – Aasur Marriage

    इस विवाह में वर के द्वारा कन्या पक्ष व उसके संबंधियों को यथाशक्ति धन देना होता था. इस विवाह में लोभ, लालच तथा कन्या की विवशता दिखाई देती है. वर्तमान समय में अभी भी कुछ भागों में ऎसा विवाह देखा जा सकता है जहाँ लालच में पड़कर पिता अपनी कन्या का विवाह जबर्दस्ती किसी लड़के से करा देता है. गरीबी की हालत में तो यह विवाह आम हो गया है और भारत के कुछ राज्य हैं जहाँ लड़कियों का अभाव हो गया है और अन्य राज्यों से पैसे देकर विवाह किया जा रहा है.

    6) गंधर्व विवाह – Gandharva Marriage

    महर्षि मनु के कथनानुसार इस विवाह में लड़का तथा लड़की जब एक-दूसरे को पसंद कर लेते हैं और प्रेम में पड़कर परस्पर संबंध स्थापित कर लेते हैं तब इसे गंधर्व विवाह कहा जाता है. प्राचीन समय में राजा-महाराजा कई बार गंधर्व विवाह करते थे. वर्तमान समय में भी लिव इन रिलेशन की पद्धति गंधर्व विवाह का ही रुप है. भारत के कुछ भागों में अभी भी ऎसे समारोहों का आयोजन किया जाता हैं जहाँ लड़की अपने लिए लड़के का चुनाव करती है और शादी होने से पहले कुछ दिन उसके साथ बिताती है.

    7) राक्षस विवाह – Rakshasa Marriage

    युद्ध में जब कोई हार जाता था तब जीता हुआ पक्ष शत्रुता के कारण राजा की कन्या अथवा उसकी विवाहिता पत्नी से जबरन विवाह कर लेता था. इसमें कई बार राजा शत्रुता के कारण भी दूसरे राजा को हराकर उसकी पत्नी से विवाह करता था. कुछ समय पहले तक जब राजाओं का राज था तब इस प्रथा का चलन था. भारत पर आक्रमण करने वाले विदेशी भी हारे हुए राजाओं की कन्याओं अथवा उनकी पत्नियों से जबर्दस्ती विवाह करते थे.

    8) पैशाच विवाह – Paishach Marriage

    इस आठवें प्रकार के विवाह को पैशाच विवाह कहा गया हैं क्योंकि इस प्रकार के विवाह में किसी सोई हुई लड़की अथवा अचेतन कन्या का हरण केवल भोग के लिए किया जाता था. यह सभी आठों प्रकार के विवाह में सबसे निकृष्ट माना गया है. आजकल बलात्कार की जो घटनाएँ हो रही हैं वह इसी पैशाच विवाह का रुप कहा जा सकता है. वर्तमान समय में केवल दो ही विवाह देखने को मिलते हैं – पहला ब्रह्म विवाह जो माता-पिता की सहमति से किया जाता है और दूसरा गंधर्व विवाह जिसमें लड़का-लड़की स्वयं एक-दूसरे को पसंद करते हैं और विवाह सूत्र में बंधते हैं.

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    Dev “Purnima Snan” Do Royal bath on “Dev-Purnima “

    Lord Jagannath will take royal shower with his elder brother Balbhadra, sister Subhadra and Sudarshan on Purnima. During this period due to 108 times weighted baths, Lord Jagannath will go to Garbhgrah to cure himself from sheetjanit disease. He will come back after one and a half month when he will be completely cured. By this duration he will be completely cured and will come back on his grand rath and then only offer darshan to his devotees one week before the purnima. For this reason, Purnima of Jyestha month is named as “Dev snan purnima”. This year it is falling on 9th June 2017. Purnima of Jyeshtha month has religious and spiritual significance. On this day the devotees of Mahadev take bath in Ganga river and start their journey for Amarnath  taking Gangajal in their hand.

    B-197, ALLAHABAD-291001 – OCTOBER 29, 2009 – Allahabad: People light lamps celebrating ‘Dev Diwali’ at Baluwaghat at the bank of Yamuna river in Allahabad on Thursday evening. PTI Photo

    Kharsava, Haribhanja, Raourkela and Bramhamrunda are the places where this royal bath is organised. Lots of preparations are initiated long before Purnima. According to Skandpuran and Bhavishya Puran, a detailed description of Devsnan Purnima is offered. According to the above mentioned Purans, the day when Lord Jagannath, his brother Balbhadra and sister Subhadra are offered royal bath, that day is termed as Dev Snan purnima. In the above stated temples, this ritual is performed on the purnima of Jyestha month. On this day the devotees serving Lord Jagannath keeps a fast and do not eat or drink anything till the time they offer bath to all the 4 Gods and Goddesses. They do paran after worshipping the lord and sun get sets. It is said that unlike Jagannath temple, other temples of that place also follow the same procedures and rituals of offering shower to the idols. The ritual of devsnan is performed outside the temples in mandaps. According to the rituals, mandaps are constructed using huge wooden logs and colourful shiny clothes. The mandap is decorated with plentiful of flowers, and leaves and make it grand. Thereafter each of the idols is brought to the mandaps for offering shower. The mahant of the temple, all those who are associated with the organisation committee and a few special devotees offer shower to the idols together. Before the royal bath, a paste of sandalwood powder, turmeric powder, saffron and tulsi is applied to the idols. Thereafter all the idols are offered bath with water. The weight of the water is 108 times of the weight of the idol. The royal bath starts at 9 O’ Clock early in the morning and continues till 11 O’ Clock. Since shower is offered to all the 4 idols, it is termed as Chaturthi snan. During this function, most of the devotees bring milk, curd and honey from their houses and put them into the water that is made ready to offer them bath. After the bath the clothes of all the devotees are changed and maha-aarti is performed of all the 4 deities. Thousands of people pay a visit to this place to see the maha-aarti. It is believed that as millions of people come to this place to see the aarti on earth, similarly 33 koti Gods and Goddess in sky collect and enjoy this grand show. It is believed that by merely taking a glimpse of this dev snan , many troubles come to an end itself on this auspicious day. People start getting auspicious indications after visiting this place. After the maha-aarti, Lord Jagannath along with his elder brother Balbhadra, sister Subhadra and Sudarshan get infected with the sheetjanit diseases. The people serving all the idols make an announcement formally that all the Gods and Goddess have caught infection because of cold water bath for such a long time. It is formally announced that since they were offered bath with water that was 108 times more than their weight, they all have become very ill. All devotes should pray to God that they get well soon so that all the 4 Gods and Goddess offer them darshan to the devotees soon. To cure them completely and offer them rest all the 4 idols are taken to Garbha- grah. All the 4 Gods and Goddess take rest in the Garbha for complete 45 days. After this all the devotees can take a glimpse of the Gods and Goddess after a week’s time during the chariot festival. In our Vedic scriptures, many stories are related with the significance of Jyeshtha Purnima. The devotees of Mahadev take bath in the river Ganga or the nearby rivers and worship thereafter. These devotees take sankalp to offer shower to Lord Mahadev with the river water through which they have taken bath themselves. These devotees fill water in the utensils after taking shower and leave for Amarnath yatra. They offer bath with this water to Lord Mahadev and consider themselves blessed after this act. Kabeer Jayanti is also celebrated on this Purnima. The story of Sati Savitri also has a straight connection with the Jyestha purnima celebrated this month.

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    गंगा दशहरा

    जल मानव जीवन का अधर है जिसका मुख्य स्रोत नदियाँ है | इसीलिए मानव सभ्यता के विकास में नदियों का महत्वपूर्ण योगदान है और सभी सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है | भारत में गंगा नदी सबसे बड़ी नदी है इसलिए इसका महत्त्व भी सबसे अधिक है | नदियों के महत्व को देखते हुआ हमारे पूर्वजों ने नदियों को देवी स्वरूप माना और उनका सम्मान किया | गंगा नदी को श्रद्धा से गंगा मैया नाम से पुकारा जाता है और उनकी पूजा की जाती है | नदियों की पूजा के पीछे का उद्देश्य लोगों को अन्दर नदियों के प्रति सजग और जागरूक करना था कि लोग उसका आदर करें और प्रदूषण न फैलाएं | यही हमारे हिन्दू धर्म की खासियत है कि हमारे जीवन में जो भी उपयोगी है हम उसका सम्मान करें |

    पौराणिक मान्यता के अनुसार ज्येष्ठ मास की शुक्लपक्ष की दशमी को गंगा दशहरा मनाया जाता है | जो इस वर्ष 12 जून को मनाया जायेगा | स्कंदपुराण के अनुसार गंगा दशहरे के दिन व्यक्ति को किसी भी पवित्र नदी पर जाकर स्नान, ध्यान तथा दान करना चाहिए ऐसा करने से मनुष्य को उसके सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है | अगर कोई व्यक्ति नदी तक नहीं पहुँच सकता तो उसे आसपास के किसी सरोवर में स्नान करना चाहिए | ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को संवत्सर का मुख कहा गया है | इसलिए इस दिन दान और स्नान का अत्यधिक महत्व है | वराह पुराण के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, बुधवार के दिन, हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग से धरती पर आई थी | जिसमें नदी में स्नान करने से दस प्रकार के पाप नष्ट होते है | इस दिन गंगा में खड़े हो कर गंगा स्त्रोत पढने से सभी प्रकार के कष्टों से छुटकारा मिलता है और जीवन में खुशहाली आती है | इस दिन माँ गंगा की पूजा करनी चाहिए और दान दक्षिणा करनी चाहिए | इस दिन जिस भी वास्तु का दान करें उसकी संख्या दस होनी चाहिए | साथ ही गंगा की कथा भी इस दिन सुनना परिवार के लिए लाभकारी होता है |

    गंगा जी की कथा

    प्राचीन काल में अयोध्या के राजा सगर ने अश्वमेघ यज्ञ किया और यज्ञ के जिस घोड़े को छोड़ा उसे देवराज इंद्र ने  महर्षि कपिल के आश्रम में छुपा दिया क्योंकि इंद्र नहीं चाहते थे कि वह यज्ञ सफल हो | इधर जब घोड़ा खो गया तो राजा सगर के साठ हजार पुत्रों ने उसे खोजना शुरू किया | जब घोड़ा मिला तो सब चोर-चोर चिल्लाने लगे जिससे कपिल मुनि की तपस्या भाग हो गई और उन्होंने अपने नेत्र खोल दिए जिससे राजा सगर के साठ हजार पुत्रों में से कोई नहीं बचा सभी जल कर भस्म हो गये |

    राजा सगर के बाद अंशुमन और फिर राजा दिलीप तीनों ने मृतकों की मुक्ति के लिए घोर तपस्या की ताकि गंगा का आगमन पृथ्वी पर हो सके | राजा दिलीप के पुत्र भागीरथी हुए जिनकी तपस्या से ब्रम्हा जी प्रकट हुए और वर मांगने के लिए कहा | तब भागीरथी ने अपने पूर्वजों की मुक्ति के लिए गंगा को पृथ्वी पर लाने की बात कही | इसके पश्चात भगवान् शिव की मदद से गंगा का पृथ्वी पर आगमन हुआ |

    आज क्या है गंगा की स्थिति

    भारत में गंगा नदी को माँ का स्वरूप माना गया है जिससे लगभग देश के 40% लोग जुड़े हुए है | इसके किनारे में बसे गाँव व शहर के लोग, पीने का पानी, सिंचाई आदि के लिए मुख्य रूप से गंगा पर आश्रित है | इस लिए इसकी आज की परिस्थिति की बात करना भी जरूरी है |

    समय के साथ मनुष्य स्वार्थी होता गया और नदियों के प्रति उनकी श्रद्धा समाप्त हो गई जिसका परिणाम यह हुआ कि लोग नदियों को प्रदूषित करने लगे | गंगा हिमालय के ग्लेशियर से निकल कर हरिद्वार से होते हुए आगे बढ़ती है | इसके बाद लगभग 120 प्रमुख शहरों से होते हुए बंगाल की खाड़ी में गिर जाती है | इन शहरों से मुख्य रूप से गंगा में कचरा आता है |

    गंगा नदी महज देश की धार्मिक और अध्यात्मिक धरोहर ही नहीं बल्कि देश की आर्थिक विकास का केंद्र भी है | तकरीबन 40 प्रतिशत लोग प्रत्यक्ष रूप से इस दायरे में आते है इस लिए गंगा के अस्तित्व के साथ देश के 40 प्रतिशत लोगों का अस्तित्व भी जोड़ कर देखना जरूरी है और इसके अस्तित्व को बचाने के लिए इसकी सफाई भी बहुत आवश्यक है |

    गंगा की सफाई

    गंगा की सफाई के इतिहास को जब देखते है तो पता लगता है कि लगभग 90 वर्ष पूर्व गंगा प्रदूषित होना शुरू हुयी थी | 1932 में कमिश्नर हाकिंस ने बनारस में एक नाले को गंगा से जोड़ने का आदेश दिया इसके बाद औद्योगिक घरानों ने भी अपने गंदे कचरे को गंगा में प्रवाहित करना शुरू कर दिया | गंगा की खराब स्थिति को देखते हुए 1985 में सबसे पहले गंगा की सफाई का कार्य शुरू हुआ जिसमे ‘गंगा एक्शन प्लान’ बना बना कर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की प्रतिबद्धता दिखाते हुए गंगा प्रदूषण रहित अभियान की शुरुआत की थी | लेकिन करोड़ों की इस योजना का कोई असर नहीं हुआ और गंगा की हालत बिगड़ती गयी |

     नमामि गंगे परियोजना

    2014 में भारत में आम चुनाव हुए जिसमें गंगा की सफाई भी अहम् चुनावी मुद्दा था जिसे लेकर नरेन्द्र मोदी ने अपने वक्तव्य में कहा था कि उनका सौभाग्य है कि उन्हें मां गंगा की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ है और चुनाव जीतने के बाद गंगा की सफाई को लेकर पीएम ने जोर शोर से नमामि गंगे परियोजना का शुभारंभ किया था | जिसके लिए 20,000 करोड़ रुपये का बजट दिया | इस परियोजना को पूरा करने का लक्ष्य 5 साल का रखा गया |

    क्या है मौजूदा स्थिति

    फरवरी 2019 में हुयी एक कांफ्रेंस में केन्‍द्रीय जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण, सड़क परिवहन और राजमार्ग तथा नौवहन मंत्री श्री नितिन गडकरी ने आश्वासन दिया है कि नमामि गंगे की सभी वर्तमान परियोजनाओं को मार्च, 2020 तक पूरा कर लिया जाएगा | उन्‍होंने कहा कि पिछले साढ़े चार वर्षों में गंगा कार्यों के लिए 27,000 करोड़ रुपयों की मंजूरी दी जा चुकी है, जबकि पिछले 50 वर्षों में केवल 4,000 करोड़ रुपये दिये गये | अब तक 276 परियोजनाओं को मंजूरी दी जा चुकी हैं, जिनमें से 82 योजनाओं को पूरा किया जा चुका है | गंगा की 40 सहायक नदियों और प्रमुख नालों पर काम शुरू हो चुका है, जो नदी की पूरी सफाई के लिए आवश्‍यक होगा। उन्‍होंने कहा कि 145 में से 70 घाट पूरे हो चुके है और 53 मुक्ति धामों पर कार्य पूरा होने वाला है |

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    स्कन्द षष्ठी (8 जून )

    ज्योतिष शास्त्र में भगवान् कार्तिक को षष्ठी तिथि व मंगल ग्रह का स्वामी कहा गया है जिनका निवास दक्षिण दिशा में है | इसलिए जिन जातकों की कुंडली में कर्क राशि अर्थात मंगल कमजोर होता है उन्हें मंगल को मजबूत करने के लिए भगवान् कार्तिक का व्रत षष्ठी तिथि को रखना चाहिए | ऐसा करने से आपको मंगल के शुभ फल प्राप्त होते है और आपकी मनोकामना पूरी होती है | इसे चंपा षष्ठी भी कहा जाता है क्योंकि भगवान् कार्तिक को चंपा के फूल बहुत पसंद है |

    पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है की एक बार जब भगवान् कार्तिकेय अपने माता पिता और अपने छोटे भाई श्रीगणेश से नाराज हो गए तो कैलाश पर्वत छोड़ कर मल्लिकार्जुन रहने चले गए | इसी समय उन्होंने स्कन्द षष्ठी के दिन दैत्य तारकासुर का वध किया और कहा जाता है कि इसीदिन कार्तिकेय देवताओं की सेना के सेनापति बने थे | 

    भारतीय पौराणिक ग्रंथों में स्कन्द पुराण भगवान् कार्तिकेय को ही समर्पित है | स्कन्द पुराण में भगवान् कर्तिकेय के 108 नामों का भी उल्लेख है | स्कन्द षष्ठी के दिन भगवान् कार्तिकेय की पूजा के साथ स्कन्द पूरण के मन्त्रों का भी उच्चारण करना चाहिए | चम्पा षष्ठी का त्योहार दक्षिण भारत, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि में प्रमुखता से मनाया जाता है।

    भगवान् कार्तिकेय को समर्पित बातू गुफाएँ  मलेशिया मलेशिया में भगवान् कार्तिकेय को समर्पित मंदिर गोम्बैक जिले में एक चुना पत्थर की पहाड़ी पर स्थित है | यह स्थान मलेशिया की राजधानी क्वालालंपुर से महज 13 किलोमीटर दूर है | पहाड़ी के पीछे बहने वाली बातू नदी के नाम पर इन गुफाओं को बातू नाम दिया गया है | इसके साथ ही पास के एक गाँव का नाम भी बातू गुफा है | यह स्थल भारत के बाहर हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थस्थल है |

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    बटुक भैरव जयंती

    ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बटुक भैरव जयंती के रूप में मनाया जाता है | भगवान् शिव के गण रूप में प्रसिद्ध भगवान् भैरव की महिमा का शास्त्रों में वर्णन मिलता है जिन्हें शिव का एक स्वरूप भी माना जाता है | यह माँ दुर्गा के अनुचारी भी माने जाते है | इनकी सवारी कुत्ता है और इनका प्रिय पुष्प चमेली है | इसी लिए इनको चमेली चढ़ाना बहुत शुभ माना जाता है | भैरव जी के नाम जप मात्र से अनेक प्रकार के रोग दूर हो जाते है साथ थी संतान को लम्बी आयु प्राप्त होती है | जिन जातकों को भूत-प्रेत बाधा है या तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है उन्हें शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन करने से समस्त कष्टों और परेशानियों से छुटकारा मिलता है | अगर आपकी कुंडली में मंगल का दोष है तो भैरव पूजा के माध्यम से पत्रिका के दोषों का निवारण किया जा सकता है | इसके साथ ही राहु केतु से सम्बंधित समस्याओं के छुटकारे के लिए भी भैरव बाबा की आराधना करनी चाहिए | भैरव की पूजा अर्चना करने से परिवार में सुख शांति, समृद्धि आती है और स्वास्थ्य में लाभ होता है |

    तंत्र के देवता भैरव बाबा को काशी का कोतवाल माना जाता है कहते है अगर कोई व्यक्ति रोज भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का पाठ करे तो उसके जीवन की अनेक समस्याएं दूर हो जाएगी और जीवन में सफलता प्राप्त होगी | खास तौर पर कालभैरव अष्टमी पर भैरव के दर्शन करने से आपको अशुभ कर्मों से मुक्ति मिल सकती है।

    भारत में प्राचीन पद्धति रही है कि हर परिवार का एक कुल देवता होता है | ऐसे ही भैरव बाबा को भी बहुत से लोग अपने कुल देवता के रूम में पूजते है | कहते है सच्चे और साफ़ मन से भैरव बाबा के सामने की गई मनोकामना को वह अवश्य पूरा करते है | भैरव उपासना जल्दी फल देने के साथ-साथ क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त खत्म कर देती है | ऐसा माना जाता है की भगवान् शिव के क्रोधित होने से भगवान् भैरब की उत्पत्ति हुयी थी इसी लिए इनकी उपासना से भगवान् शिव भी प्रसन्न रहते है |

    काल भैरव मंदिर

    मध्यप्रदेश के उज्जैन में कालभैरव के ऐतिहासिक मंदिर है जहाँ श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है | पुरानी धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कालभैरव को यह वरदान है कि भगवान शिव की पूजा से पहले उनकी पूजा होगी | इसलिए उज्जैन में महाकाल के दर्शन से पहले  कालभैरव के मंदिर जाना अनिवार्य है | तभी महाकाल की पूजा का लाभ आपको मिल पाता है |

    ऐसे करें बटुक भैरव की पूजा

    अष्टमी के दिन स्नान आदि से निवृत्त हो कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए और फिर बटुक भैरव की पूजा करनी चाहिए | पूजन में लाल कनेर एवं गुलहड़ की माला अर्पित करनी चाहिए | साथ ही खीर, आटे या मावे के लड्डू, बेसन के लड्डू एवं तले हुये पकवान का भोग लगाना चाहिए | इस दिन की विशेष बात यह है कि कुत्ते को भोजन भी अवश्य कराना चाहिए | अगर आप बटुक भैरव के उपासक है तो आपको कभी भी कुत्तों को  प्रताड़ित नहीं करना चाहिए, क्योंकि बटुक भैरव के लाल ध्वज पर कुत्ते का चिन्ह होता है | बटुक भैरव जयन्ती पर उनका पूजन करना आवश्यक होता है | स्वयं एवं सामग्री का शुद्धिकरण करने के पश्चात एक चौकी पर लाल रेशमी वस्त्र बिछा कर रोली से रंगे हुये लाल अक्षतों से अष्ट दल पुष्प बनाकर और उस पर बटुक भैरव के चित्र की स्थापना कर तदोपरान्त गणेश, अम्बिका, कलश, नवग्रह, षोडष मात्र आदि का पूजन कर प्रधान पूजा के रूप में ही बटुक भैरव की पूजा करनी चाहिए |

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    जात जुलाहा नाम कबीरा

    जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप

    जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप ।।

    कबीर दास की गिनती संतों में की जाती है क्योंकि वह अपने व्यक्तित्व से एक संत थे | संतों और महापुरुषों ने दया और क्षमा को धर्म का मूल माना है | लोभ, मोह, काम, क्रोध अंहकार आदि वे दुर्गुण हैं जो मनुष्य को धर्म और मनुष्यता बहुत से दूर ले जाते हैं | जिस समय देश में धार्मिक कर्मकांड और पाखंड का बोलबाला था ऐसे समय में एक क्रांतिकारी संत, समाजसुधारक का जन्म हुआ जिन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों के पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई | उन्होंने मनुष्यता को अपना धर्म माना और लोगों में भक्ति भाव का बीज बोया | ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को संत कबीर की जयंती मनाई जाती है। अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार इस वर्ष कबीर जयंती 17 जून को है |

    कबीर के जन्म की बात करें तो विद्वानों के अनेक मत है | कोई भी प्रमाणिक तथ्य नहीं मिलता | सबसे ज्यादा प्रचलित मत के अनुसार उनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था| जन्म के बाद उनकी माँ ने उन्हें काशी के लहरतारा नामक स्थान पर छोड़ दिया गया जहां वह नीरु और नीमा नाम से दंपत्ति को मिले | पेशे से यह परिवार जुलाहा जाति से था | कबीर का जन्म सन् 1398 में माना जाता है | उनका लालन-पालन नीरु और नीमा के आंगन में ही हुआ | जिसका प्रमाण कबीर के काव्य में भी कई जगह मिलता है- जात जुलाहा नाम कबीरा| राम के नाम को सर्वजन तक पंहुचाने और सर्वव्यापी करने में कबीर का बहुत अधिक योगदान है | हालांकि उनका राम दशरथ पुत्र और विष्णु के अवतार से भिन्न निर्गुण राम है जो रोम रोम में रमा हुआ है |

    आज भी प्रासांगिक हैं कबीर

    अपने समय में कबीर जितने प्रासंगिक थे आज भी उतने ही प्रासंगिक है कबीर ने मध्यकाल में जो बाते कही हैं आज 21वीं सदी में भी वे ऐसी लगती हैं जैसे आज के बारे में ही कही गयी हों |  कबीर एक मानवता के पक्षधर हैं वे जीव हत्या के घोर विरोधी थे | कबीर धर्म के विरोध में नहीं बल्कि धर्म के नाम पर होने वाले पाखंड का विरोध करते थे | वे जात-पात का विरोध करते हैं क्योंकि उन्होंने जात-पात के आधार पर होने वाले अनेक अन्यायों को देखा और शोषित समाज का दर्द महसूस किया | कबीर ने मनुष्यता का सन्देश दिया और देश भर में भक्ति का प्रचार किया | देश के अनेक हिस्सों में घूमें और लोगों को निराकार ब्रह्म की उपासना का सन्देश दिया | उनके पदों को आज भी लोग गुनगुनाते मिल जायेंगे | हिंदी साहित्य के विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कबीर को भाषा का डिक्टेटर कहा है | कबीर ने किसी विशेष पद्दति का प्रयोग न करके आम बोलचाल की भाषा को अपने काव्य की भाषा बनायीं जिसकी वजह से वह साधारण मनुष्य के ज्यादा नजदीक थे | जीवन के अंतिम समय में भी उन्होंने लोगों के मध्य फैले अंधविश्वास को तोड़ने का प्रयास किया | उस समय लोगों का मानना था की काशी में मरने वाले को स्वर्ग और मगहर में मरने वाले को नरक मिलता है इसका खंडन करने के लिए उन्होंने अपने प्राण मगहर में त्यागे | इस तरह 1518 में संत कबीर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया |

    कबीर मूर्ति पूजा के घोर विरोधी थे पर कालांतर में उनके अनुयायियों ने उनकी ही मूर्ति बना कर उनकी पूजा करनी शुरू कर दी है | साथ ही उन्हें जाती विशेष में बंधने की कोशिश की जो सच्चे अर्थों में उनका सही अनुसरण नहीं है |

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    क्षीर भवानी मेला

    कहते है अगर स्वर्ग कहीं है तो कश्मीर में है | कश्मीर की सुन्दरता सबका मन मोह लेती है | ऐसी ही सुन्दर वादियों के बीच माता क्षीर भवानी का मंदिर स्थित है | जो कश्मीर में तुलतुला के पास स्थित है | यह कश्मीरी पंडितों के लिए आस्था का केंद्र है | जहाँ ज्येष्ठ अष्टमी को भव्य मेले का आयोजन किया जाता है | इस मंदिर के बारे में लोग बताते है कि जी जगह पर मंदिर बना हुआ है वहां पहले एक तूत का पेड़ था | जिसे देवी का प्रतीक माना जाता था और उसकी पूजा की जाती थी और इसी की वजह से इसके समीप स्थित गाँव का नाम तुलतुला पड़ गया | यहाँ माँ को मीठा या खीर का भोग लगाया जाता है | खीर का भोग लगाने की वजह से ही इन्हें  क्षीर भवानी नाम से जाना जाता है |  जिस जलकुंड में देवी का मंदिर है उसकी लम्बाई 60 फीट है और इसकी आकृति शारदा लिपि में लिखित ॐ के जैसी है | इस जल कुंड के जल का रंग बदलता रहता है जिसके सम्बन्ध में यहाँ के लोगों की मान्यता है कि कुण्ड में माता का दिव्य प्रभाव है | लोगों का विश्वास है कि चश्में का पानी अगर साफ़ है तो सबके लिए अच्छा शगुन है लेकिन अगर पानी मटमैला है तो कष्ट और परेशानी का करण बनता है | भारत के महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद जब 1868 में कश्मीर आये थे तब अपनी यात्रा के अधिकांश दिन देवी में के चरणों में व्ययतीत किये थे | प्रतिवर्ष ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को क्षीर भवानी के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है इस दिन भक्तजन काफी मात्रा में आते हैं और यहां मेला लगता है।

    निर्माण काल

    इस मंदिर का निर्माण 1912 में महाराजा प्रताप सिंह ने शुरू किया था | जिसे बाद में राजा हरी सिंह ने पूरा करवाया था | क्षीर भवानी के अलावा  इन्हें महाराग्य देवी, रग्न्या देवी, रजनी देवी, रग्न्या भगवती आदि अन्य प्रचलित नामों से भी पुकारा जाता है |

    कब जाएँ

    प्रत्येक वर्ष ज्येष्ठ (मई-जून) के अवसर पर मंदिर में वार्षिक उत्सव का आयोजन किया जाता है। यहां मई के महीने में पूर्णिमा के आठवें दिन बड़ी संख्या में भक्त एकत्रित होते हैं। ऐसा विश्वास है कि इस शुभ दिन पर देवी के कुंड का पानी बदला जाता है। ज्येष्ठ अष्टमी और शुक्ल पक्ष अष्टमी इस मंदिर में मनाये जाने वाले कुछ प्रमुख त्यौहार हैं |

    की संख्या में कश्मीरी पंडित जेष्ठा अष्टमी के मौके पर खीर भवानी मंदिर में उमड़ते हैं. इस वर्ष यह उत्सव यहां 2 जून को आयोजित हुआ. इस अवसर पर लगने वाले मेले में यहां बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित पहुंचे. खीर भवानी मंदिर को रगनया देवी माता का मंदिर भी कहा जाता है. 

    श्रीनगर से करीब 30 किलोमीटर दूर मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में यह वार्षिक उत्सव प्रसिद्ध रगन्या देवी मंदिर में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के प्रतीक के तौर पर मनाया जाता है. उत्सव पर इस मंदिर में भक्त मंत्रोच्चार के बीच पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा में इस्तेमाल के लिये सामग्री का सारा इंतजाम स्थानीय मुसलमान करते हैं. यहां जानते हैं इस मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के बारे में…

    हनुमानजी ने देवी का आसन किया था स्थानांतरित…
    हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक, देवी रगनया रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर उसके समक्ष प्रकट हुई थीं। रावण ने श्रीलंका में देवी की एक प्रतिमा स्थापित की थी, लेकिन रावण के जीवन के अनैतिक तरीकों से क्रुद्ध देवी ने हुनमान को उनका आसन वहां से कश्मीर स्थानांतरित करने का आदेश दिया। जिसे हनुमानजी ने मान लिया और कश्मीर में उनका उनको स्थापित कर दिया।

    टिप्पणियां

    इस मंदिर का प्रचलित नाम खीर भवानी इसलिए है क्योंकि यहां देवी को पारंपरिक रूप से खीर चढ़ाई जाती है. 

    ऐसी भी मान्यता है कि किसी प्राकृतिक आपदा के आने से पहले मंदिर के कुण्ड का पानी काला पड़ जाता है.

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    अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून

    “योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है | मनुष्य और प्रकृति के बीच सामंजस्य है | विचार, संयम और पूर्ति प्रदान करने वाला है तथा स्वास्थ्य और भलाई के लिए एक समग्र दृष्टिकोण को भी प्रदान करने वाला है। यह व्यायाम के बारे में नहीं है, लेकिन अपने भीतर एकता की भावना, दुनिया और प्रकृति की खोज के विषय में है। हमारी बदलती जीवन- शैली में यह चेतना बनकर, हमें जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद कर सकता है।

    27 सितम्बर 2014 को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने की घोषणा की | इसके बाद 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 177 देशों द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मंजूरी दी | इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 90 दिनों का समय लगा | 

    21 जून को योग दिवस मनाये जाने का कारण

    प्राचीन काल से ही भारत में योग साधना का महत्व रहा है | हमारे पूर्वजों ने योग साधना के माध्यम से मनुष्य के शरीर में होने वाली अनेक समस्याओं को दूर करने में महारत हासिल कर ली थी | योग के माध्यम से शरीर को स्वस्थ रखना और शारीरिक क्षमता का विकास करना संभव है इसीलिए प्राचीन काल से ऋषि-मुनियों की दिनचर्या का एक मुख्य हिस्सा योग भी रहा है | इन्हीं पूर्वजों ने योग साधना पर अनेक प्रयोग किए और पाया कि योग विज्ञान के अनुसार जब 21 जून को ग्रीष्म संक्रांति होती है और सूर्य धरती की दृष्टि से उत्तर से दक्षिण दिशा में चलना शुरू कर देता है तब योग का अत्यधिक लाभ प्राप्त होता है | इस दिन से सूर्य दक्षिणी गोलार्ध के सामने आ जाता है | योगिक कथाओं के अनुसार शिव ने ग्रीष्म संक्रांति के बाद आने वाली पहली पूर्णिमा के दिन अपने सात शिष्यों को शिक्षा देकर योग का प्रसार किया था | इस समय आध्यात्मिक साधना करने वाले लोगों को प्रकृति की तरफ से स्वतः सहयोग मिलता है |

    आधुनिक युग में योग –   

    समय के साथ हम में अनेक बदलाओं हुए और योग सम्बन्धी ज्ञान हम भूलते चले गए | यह ज्ञान महज हमारे प्राचीन ग्रंथों तक सीमित हो गया | परन्तु उन्नीसवीं शताब्दी में एक बार फिर दुनिया को योग से स्वामी विवेकानंद ने परिचित कराया है और उसके महत्व का प्रचार-प्रसार किया | उन्होंने 1893 में अमेरिका के शिकागो विश्व धर्म सम्मलेन में संसद को संबोधित किया जिसके बाद कई गुरुओं व योगियों ने दुनिभर में योग का प्रचार किया जिसे बड़े स्तर पर स्वीकार किया गया | इसके बाद योग पर बहुत से शोध हुए और गहन अध्ययन से पता चला की योग हमारे लिए मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत फायदेमंद है | पिछले कुछ सालों में योग को पूरी दुनिया ने खुले दिल से स्वीकार किया है | दुनिया भर के बड़े-बड़े नेता, अभिनेता, मॉडल व खेल से जुड़े लोगों ने योग के विस्तार में अहम भूमिका निभाई | पिछले दो दशक से योग गुरुओं और संस्थाओं ने वर्ष में एक दिन को योग दिवस के रूप में मनाएं जाने के लिए कह रहे थे | इस इच्छा को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरा किया |  

    योग गुरु स्वामी रामदेव  

    योग साधना को उसकी बुलंदियों तक पहुँचाने में स्वामी रामदेव का महत्वपूर्ण योगदान  है | उन्होंने योग को स्वस्थ, सुन्दरता, आदि से वैज्ञानिक रूप से जोड़ दिया | उन्होंने योग के प्रचार प्रसार की शुरुआत 1995 में हरिद्वार में योग मंदिर ट्रस्ट के साथ शुरू की | योग साधना के प्रचार अभियान में आयुर्वेद मनीषी स्वामी बालकृष्ण महाराज ने साथ दिया | इस अभियान के माध्यम से आरोग्य, आध्यात्मिक और शैक्षणिक संस्थानों का सञ्चालन तो हो ही रहा था साथ ही वैदिक शिक्षा और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था पर आधारित गुरुकुल भी खोला गया | इन सब के साथ योग शिविर की शुरुआत की गयी जिसमें हजारों की तादाद में लोग शामिल होने लगे | इसके बाद टेलीवीजन चैनल आस्था के माध्यम से योग शिविरों प्रसारण होने लगा जिसे खूब लोकप्रियता मिली और भरी संख्या में योग से लोग जुड़ते चले गए | आज के समय में उनके कार्यक्रम पूरे एशिया, ऑस्ट्रेलिया, यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका में बेहद लोकप्रिय है | उनका योग और प्राणायाम चिकित्सकीय है और इसमें आयुर्वेद भी साथ है  | 6 अगस्त 2006 को स्वामी रामदेव की महत्वाकांक्षी परियोजना पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट का शुभारंभ हरिद्वार में को हुआ। इसके ज़रिए उन्होंने विश्व का सबसे बड़ा योग, आयुर्वेद चिकित्सा और प्रयोग तथा प्रशिक्षण का केन्द्र खोला | जहाँ योग पर अनेक प्रकार के शोध किये जाता है और अनेक बिमारियों का इलाज आयुर्वेद और योग के माध्यम से खोजा जाता है |

    योग के वैज्ञानिक लाभ सिद्ध करेगा एम्स –

    आधुनिक दवाओं के साथ योग को वैज्ञानिक मान्यता दिलाने के लिए एम्स के कई विभाग शोध में लगे हुए है |  कार्डियक, रेस्पिरेटरी, न्यूरो, डायबिटीज के साथ ज्यादा ध्यान लाइफ स्टाइल डिसीज़ और उसपर पड़ने वाले योग के प्रभाव को लेकर है | एम्स के डॉक्टर गुलेरिया ने बताया कि मेडिसिन के साथ योग अपनाने से मरीज की सेहत में तेजी से सुधार के सैकड़ों उदाहरण है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय आधुनिक विज्ञानं में इसको तब तक नहीं सुधार जा सकता जब तक समूचे मैकेनिज्म यानी योग से शरीर के भीतर होने वाले अन्दुरुनी बदलाव से पर्दा नहीं उठ जाता | इसे सिद्ध करने के लिए एम्स में लाइफ स्टाइल डिजीज से जुड़े अधिकांश विभाग एविडेंस बेस्ड रिसर्च में जुटे हुए हैं। साथ ही यह भी जानने का प्रयास किया जा रहा है कि किसी भी बीमारी में कैसा योग करना चाहिए और उसका मानक क्या होगा |

    योग के सम्बन्ध में एम्स के रिसर्च का इतिहास काफी पुराना है | योगियों ज्ञानेन्द्रियो पर काबू पाने को लेकर पहला शोध एम्स ने 1957 में शुरू किया था जो 61-62 में पब्लिश भी हुआ जिसमें वैज्ञानिकों ने ये बताया कि योग के जरिये योगी अपने धड़कनों को रोक तो नही सकते लेकिन योग्याभ्यास से उसपर एक हदतक काबू जरूर पा सकते है इसके बाद एम्स ने 1990 के एक शोध में पाया की योग के माध्यम से मस्तिष्क को रिलैक्स और नॉन रिलैक्स दोनों ही किया जा सकता है।

    एम्स के डिपार्टमेंट ऑफ़ फिजियोलॉजी के डॉक्टर डॉ केके दीपक बताते है कि योगिक क्रिया से रक्त में हानिकारक पदार्थों की बढ़ी मात्रा पर नियंत्रण होता है जिससे रक्त में शुद्धता आती है और उसका सकारात्मक प्रभाव शरीर के सभी वाइटल ऑर्गन्स के काम काज पर पड़ता है। इंफ्लामेशन पर कंट्रोल से बीमारियों पर नियंत्रण संभव हो जाता है।

    एम्स में कुछ समय पहले ही योग का एक अलग डिपार्टमेंट भी स्थापित किया गया है जिससे योग के क्षेत्र में शोध को एक नई दिशा मिली है। शोधकर्ताओं के मुताबिक अब तक के नतीज़े सकारात्मक हैं।

    अस्थमा और सीओपीडी 

    इस बीमारी पर हो रहे रिसर्च टीम का हिस्सा खुद एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया हैं। उन्होंने बताया कि अगर अस्थमा के पेशंट्स 10 दिनों तक बताये गए सही योगासन कर लें तो उन्हें बार-बार सांस फूलने की दिक्कत में आराम मिल सकता है | उन्होंने यह भी बताया कि सीओपीडी की समस्या से ग्रसित लोगों को भी अगर योगासन करवाया जाए, तो एक ही हफ्ते में इनहेलर की जरूरत कम पड़ती है और बाहर से लगाई जाने वाली ऑक्सीजन में भी कमी आती है। उन्होंने बताया कि इससे मरीज रोजमर्रा की परेशानियों से भी बचा रहता है।

    दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ने कई शोध करके योग की अहमियत पर मुहर लगा दी है। मोटापा, तनाव, मधुमेह, अस्थमा, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियों के इलाज में दवा के साथ-साथ योग किया जाए तो यह टॉनिक का काम करता है। इसे ध्यान में रखते हुए एम्स यह प्रोटोकॉल तैयार करने में लगा है कि किस बीमारी में योग का कौन सा आसन लाभदायक रहेगा। इसके लिए संस्थान के विभिन्न विभागों में योग से जुड़ी 20 परियोजनाओं पर शोध चल रहा है। जिसमें विवेकानंद योग अनुसंधान संस्थान के 10 योग विशेषज्ञ  मदद कर रहे हैं। इसका मकसद योग के फायदों पर प्रमाण एकत्रित करना है, ताकि इलाज में योग की भी

    खून की गुणवत्ता में भी परिवर्तन

    योग से शरीर के अंदर कई तरह के परिवर्तन आते हैं। एम्स में कुछ मरीजों को 12 सप्ताह तक योग कराकर उनके खून की जांच की गई तो पाया गया कि ब्लड प्रेशर, स्ट्रॉक, तनाव आदि बीमारियों के लिए जिम्मेदार मार्कर की कमी आ गई थी।

    हृदय के मरीजों को भी लाभ

    योग हृदय के ऐसे मरीजों के लिए भी उपयोगी है जिनकी बाईपास सर्जरी संभव नहीं होती। एम्स में वर्षो पहले किए गए शोध में यह पाया गया था कि सर्जरी नहीं हो पाने के बावजूद योग ऐसे मरीजों का जीवन बढ़ाने में मददगार है।

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